Thursday, 24 February 2011

बाजीप्रभु का बलिदान

बाजीप्रभु का बलिदान
 
६ महीनों से पन्हाला किले में घिरे थे शिवाजी
आदिल शाही सेना ने सोचा मार ली हमने बाज़ी
 
पर शिवाजी की तरफ भी थे एक 'बाजी'
शिवा को बचाने के लिए लगायी प्राणों कि बाज़ी
 
आदिल शाही का घेरा था काफी कड़ा
वो हर रास्ता था रोके खड़ा
 
तय हुआ ६०० मावले तोड़ेंगे घेरा
जब बाहर रहेगा एकदम अँधेरा
 
बाजीप्रभु ने कहा जबतक हैं मेरे शरीर में प्राण
दुश्मन आपकी ले न सकेगा जान
 
बाहर अँधेरा था और थी ज़ोरों की बारिश
शिवाजी को बचाने की करनी थी सबको कोशिश
 
अँधेरे में ६०० मावलों के साथ हाथों-हाथ
निकल पड़ी दो पालकियां साथ साथ
 
एक पालकी में थे शिवाजी महाराज खुद 
दूसरे में महाराज का भेस धरे नाई शिवा कासिद
 
एक जगह घेरा था कमज़ोर
६०० बांकुरों ने तुरंत उसे दिया तोड़
 
आदिल शाही सेना में मच गयी अफरा तफरी
समझ में उन्हें आया दुश्मन ने की कहीं गड़बड़ी
 
तुरंत पीछा करने के लिए सेना दौड़ाई
पकड़ में आ गया शिवा कासिद नाई
 
पेश किया उसे सिद्दी जौहर के सामने
शिवाजी नाम बताया सबको उसने
 
पर किसी ने उसे पहचान लिया
तुरंत ही शिवा कासिद को मार दिया

अपने प्राण त्याग कर दिखाया शिवा कासिद ने सबको
निहत्थे भी तैयार थे अपने प्राण न्यौछावर करने को 

पर शिवा कासिद ने दे दिया इतना समय
काफी दूरी पैदल शिवाजी ने कर ली तय
 
इधर बाजीप्रभु ने कहा शिवाजी से
आप ३०० वीर लेकर निकल जाएँ चुपके से
 
इधर मैं ३०० सैनिक लेकर दुश्मन की करता हूँ अगवानी
आपको विशालगढ़ पहुंचकर तीन बार तोप है दगवानी
 
शिवाजी ने कहा साथ जियेंगे साथ मरेंगे 
बाजी ने कहा 'स्वराज्य' के लिए आप जियेंगे
 
बाजी ने कहा हम जीत लेंगे हारी हुई बाज़ी
आप तक पहुँच न सकेंगे ये दुश्मन पाजी 
 
पतले से दर्रे में बाजीप्रभु ने मोर्चा जमाया 
दुश्मन ने अल्लाह-ओ-अकबर का नारा लगाया  
 
दोनों दलों में होने लगी ज़बरदस्त मारकाट 
बाजी ने दुश्मनों की लाशों से दर्रे को दिया पाट
 
पर तीन सौ के सामने थे तीन हज़ार
कब तक ये रणबांकुरे उनसे पाते पार
 
लड़ते लड़ते बीत गयी सारी रात
बाजीप्रभु ने रख ली अपनी बात
 
लड़ते लड़ते बाजीप्रभु हो गए बुरी तरह घायल
पर दुश्मन भी उनकी बहादुरी का हो गया कायल
 
इतने में लगी उनके सीने में एक गोली
बाजी ने लगायी हर हर महादेव की बोली
 
बाजी ने कहा जब तक सुनाई न पड़े तोप की आवाज़
दुश्मन मुझे मार ना पायेंगे आज
 
उठकर बाजीप्रभु चल दिए फिर लड़ने
दुश्मन के बढ़ते दबाव में मावले भी लगे कटने
 
उधर विशालगढ़ भी था घिरा हुआ
पर शिवा लड़ते लड़ते अन्दर दाखिल हुआ
 
गढ़ में घुसते ही शिवाजी ने तीन बार तोप दगवायी
तोपों की आवाज़ सुनकर बाजी के चेहरे पे मुस्कान आयी 
  
बोले बाजी मर सकता हूँ अब मैं चैन से
बाजी का बलिदान व्यर्थ होता कैसे ?
 
बाजी और ताना जी का बलिदान न गया व्यर्थ
शिवाजी के 'स्वराज्य' को दिया एक नया अर्थ
 
बाजीप्रभु के बलिदान को याद रखेगा ज़माना
बच्चा बच्चा आज भी गाता है उनकी याद में तराना
 
 
                                                                                   - ए. के. श्रीवास्तव
                                                                                     ई - ५, नोट मुद्रण नगर,
                                                                                     मैसूर - ५७०००३, कर्नाटक
                                                                                     दूरभाष - ०८२१-२५८१९०१

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