Tuesday, 1 March 2011

भोपाल त्रासदी और उसके बाद

भोपाल त्रासदी और उसके बाद
 
ढाई दशक हो गए करते तर्क कुतर्क
और ढाई लाख लोगों का हो गया बेड़ा गर्क
 
लोगों की ज़िन्दगी बना दी है नर्क
दिल्ली में सियासतदानों को पड़ता नहीं कोई फर्क
 
अगर सरकार को लगता है ७७०० करोड़ दिया जाना चाहिए पीड़ित जनता को
तो हम क्यों ताकें अमेरिका के वार्रेन अन्डर्सन के मुंह को
 
अगर सरकार वाकई चाहती है गैस पीड़ितों को हर्जाना देना
तो क्यों करती रहती है अनगिनत बहाना
 
आखिर सालाना बजट में होता है हज़ारों करोड़ का घाटा
जनता ७७०० करोड़ का और सह लेगी चांटा  
 
                                                                                    - ए. के. श्रीवास्तव
                                                                                                                   ई - ५, नोट मुद्रण नगर,
                                                                                                                   मैसूर - ५७०००३, कर्नाटक
                                                                                                                   दूरभाष - ०८२१-२५८१९०१

Thursday, 24 February 2011

हिंदी भाषा का पतन

                                        हिंदी भाषा का पतन
 
आज जो हम हिंदी भाषा पढ़ रहे हैं उसका उद्गम आज से करीब १५० वर्ष पहले हुआ. आज की हिंदी में संस्कृत, उर्दू और फारसी का मिश्रण है. १८९३ में वाराणसी शहर में काशी  नागरी  प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई जिसने हिंदी भाषा के विकास के लिए काफी काम किया. उसमे भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी और रामचंद्र शुक्ल जैसे विद्वानों ने हिंदी भाषा के सर्वांगीण विकास के लिए काफी काम किया. १९ वीं शताब्दी के अंत में और २० वीं शताब्दी की शुरुआत में ये कार्य किया गया. २० वीं शताब्दी  के आते आते नए नए लेखक और कवि इसके प्रभाव में आने लगे और अपनी क्षमता अनुसार साहित्य सृजन करने लगे. कहानीकारों में मुंशी प्रेमचंद प्रमुख थे तो नाटककार के रूप में पंडित जयशंकर प्रसाद अग्रणीय थे. कवियों में कई लोग सामने आये 'हरिऔध', मैथिलीशरण गुप्त, सूर्यकांत मणि त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा इत्यादि. ये सभी लोग परोक्ष या अपरोक्ष रूप से काशी नागरी प्रचारिणी सभा के हिंदी विकास कार्यों से प्रभावित थे और इन सभी ने अपनी अपनी तरह से हिंदी भाषा के विकास में अपना भरपूर योगदान दिया. ये सब करते करते पांच दशक निकल गए और १९४७ में भारत अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद हो गया. चूंकि हमलोग गुलाम थे इसलिए हिंदी के विकास पर उतना ध्यान सरकारी तौर पर   नहीं दिया गया. उत्तर प्रदेश में अंग्रेज़ी और उर्दू ही सरकारी महकमों में ज्यादा चलती थी. मुंशी प्रेमचंद ने भी साहित्य सृजन की शुरुआत उर्दू कहानियों से की. उनकी पहली कहानी 'संसार का सबसे अनमोल रतन' उर्दू में ही थी.
 
जब  आज़ादी मिली तो महात्मा गाँधी की इच्छा थी कि सरकार हिंदी के जितने भी मूर्धन्य विद्वान् उस वक़्त उपलब्ध हैं, उनको सरकारी खर्चे पर नियुक्त करके हिंदी भाषा को तकनीकी तौर पर और मज़बूत बनाया जाए जिससे आम जनता की अंग्रेजी पर निर्भरता धीरे धीरे समाप्त हो जाए. पर राष्ट्र का दुर्भाग्य था कि आज़ादी के चन्द महीनों बाद ही महात्मा गाँधी नहीं रहे और उनका सपना अधूरा रह गया. राष्ट्र के सामने गांधी जी के बाद जवाहरलाल नेहरु ही एक ऐसी शख्सियत थे जो भारतीय जनमानस के सरताज थे. नेहरु जी, जैसा कि सब जानते हैं, उनकी उच्च शिक्षा इंग्लैंड में हुई थी और उनपर अंग्रेजियत का काफी प्रभाव था. इसलिए उन्होंने गाँधी जी के सुझावों पर ध्यान नहीं दिया. उनके समय में हिंदी साहित्यकारों ने अपने बलबूते पर जो कुछ भी किया उसको उन्होंने रोका नहीं पर सरकारी तौर पर कुछ ऐसा भी प्रयास नहीं किया कि हिंदी को प्राथमिकता देकर उसका विकास किया जाए. 
 
नेहरु जी ने जब देश की बागडोर अपने हाथों में ली तो उत्तर भारत में तो हिंदी का बोलबाला था, पर दक्षिण भारत में क्षेत्रीय भाषाओँ चलन था. उसकी वजह से अंग्रेजी ही एक ऐसी भाषा हो गयी जो सबको समझ में आ सकती थी. नेहरु जी ने आज़ादी के नौ वर्षों बाद, १ नवम्बर १९५६ को  'भाषा राज्यों' की स्थापना की मसलन कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र इत्यादि. इस वजह से दक्षिण राज्यों में हिंदी का प्रचार प्रसार मुश्किल हो गया. तमिलनाडु ने तो हिंदी भाषा के विरुद्ध ही मुहीम चला रखी है. भारतीय संविधान में भी हिंदी भाषा की स्तिथि स्पष्ट नहीं है.
 
इधर भारत में तकनीकी विकास की वजह से जन साधारण में टीवी का काफी प्रचार हो गया. आठवें दशक से धीरे धीरे टीवी ने रेडियो का स्थान लेना शुरू कर दिया. नवें दशक तक तो टीवी कार्यक्रम भारत सरकार ही नियंत्रित करती थी, तो उसमे हिंदी की ज्यादा अवहेलना नहीं की गयी. लेकिन १९९१ में विश्व पटल पर एक ऐसी घटना घट गयी जिसने आने वाले समय में प्रचार माध्यम में क्रांति ला दी. १९९१ की  शुरुआत में खाड़ी युद्ध छिड़ गया जिसको पूरे विश्व ने टीवी पर देखा. घर बैठे बैठे लोगों ने युद्ध को टीवी पर देखा. तो भारतीय जनता इसके प्रभाव  से   कहाँ  बच   पाती. उसके बाद धीरे धीरे प्राइवेट चैनलों ने अपनी पैठ जमा ली.   उसमे हिंदी के कार्यक्रम तो आते हैं पर जन साधारण के सामने हिंदी भाषा का जो रूप प्रस्तुत किया गया वो बम्बईया भाषा थी जो व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध हिंदी नहीं कही जा सकती. उदहारण के लिए गुजराती लोग 'अपना' की जगह पर 'मेरा' प्रयोग करते हैं, मसलन मैं  'मेरे घर' जा रहा हूँ , मैं 'मेरा पैसा' खर्च कर रहा हूँ, इत्यादि जो प्रांतीय भाषा का प्रभाव लगता है. उसके पहले साठ के दशक से  हिंदी  सिनेमा  में  
बम्बईया हिंदी का प्रयोग काफी था जन साधारण को खराब हिंदी सिखाने के लिए. ऐसी कोई सरकारी नीति नहीं बनी जो भाषा पर नियंत्रण रखे. आजकल हिंदी सिनेमा में में कला और वास्तविकता के नाम पर हिंदी भाषा के वर्जित शब्दों का प्रयोग होने लग गया है जिसे हम आप परिवार में सुनना पसंद नहीं करते और इसकी वजह से परिवार के साथ फिल्म देखना भी मुश्किल हो जाता है. पर सेंसर बोर्ड कला और वास्तविकता के नाम पर इन हिस्सों को नहीं काटते हैं और पूरी की पूरी फिल्म आम जनता के सामने आ जाती है. बेनडिट  क़ुईन, गुलाल,  ओंकारा ऐसी फिल्मों के ज्वलंत उदाहरण हैं. इन सबके चलते और चूंकि जैसा मैंने पहले लिखा है की हिंदी तकनीकी दृष्टि से उतनी उन्नत भाषा नहीं रही, जनता की निर्भरता अंग्रेजी पर ही बनी हुई है. बच्चों के दिल-ओ-दिमाग में भी ये बैठा दिया गया है कि हिंदी जानने से नौकरी नहीं मिलेगी, अंग्रेजी का ज्ञान नितांत  आवश्यक है.
 
अगर हिंदी भाषा को बचाना है तो सरकारी नीतियों में आमूल परिवर्तन लाना होगा. जो हिंदी के मूर्धन्य विद्वान् हैं उनको सरकार कि तरफ से प्रोत्साहन मिलना चाहिए जिससे वे जन मानस में हिंदी के विकास के लिए कार्य कर सकें. आज हालत इतनी खराब है कि आजकल के  बच्चों और कुछ बड़ों को भी हिंदी की वर्णमाला और गिनती नहीं का ज्ञान नहीं है. हिंदी भाषाओँ पर क्षेत्रीय भाषाओँ का ज्यादा प्रभाव दिखता है. मसलन बंगाली में केवल पुल्लिंग का प्रयोग होता है जैसे लड़का आ रहा और लड़की भी आ रहा है. 'रही' शब्द का प्रयोग नहीं हुआ. हमारी शिक्षा पद्धति में भी दोष है. कक्षा ५ तक के बच्चों को अंग्रेजी और उर्दू के उन शब्दों का प्रयोग करने की मनाही नहीं है जिनको हिंदी भाषा ने स्वीकार कर लिया है पर उन्ही शब्दों का प्रयोग छठी कक्षा में आकर निषिद्ध हो जाता है. उसकी वजह से बच्चों को हिंदी से घबराहट होने लगती है.घर में तो हिन्दुस्तानी का ही प्रयोग होता है. भाषा के प्रति प्रेम अनायास ही नहीं हो सकता है. हिन्दुस्तानी से हिंदी की तरफ रूपांतरण को सहज रूप से छात्र छात्राओं के सामने प्रस्तुत करना चाहिए. ये सब अगर किया जाए तब ही बच्चों के मन में हिंदी भाषा के प्रति प्रेम जागेगा. इन सब चीज़ों पर विद्वानों और शिक्षाविदों को गौर करना चाहिए. 
 
अगर ये सब जल्दी ही नहीं किया गया तो वो दिन दूर नहीं जब हिंदी भाषा जन साधारण के लिए बहुत दूर हो जायेगी, लुप्त हो जायेगी. गाँधी जी का सपना कि 'हिन्दुस्तानी' का विकास होना चाहिए, उसको अगर सच करना है तो उपरोक्त सुझावों को अमली जामा पहनाना होगा. 
 
 
 
 
 - ए. के. श्रीवास्तव
   ई - ५, नोट मुद्रण नगर,
   मैसूर - ५७०००३, कर्नाटक
   दूरभाष - ०८२१-२५८१९०१
 

बाजीप्रभु का बलिदान

बाजीप्रभु का बलिदान
 
६ महीनों से पन्हाला किले में घिरे थे शिवाजी
आदिल शाही सेना ने सोचा मार ली हमने बाज़ी
 
पर शिवाजी की तरफ भी थे एक 'बाजी'
शिवा को बचाने के लिए लगायी प्राणों कि बाज़ी
 
आदिल शाही का घेरा था काफी कड़ा
वो हर रास्ता था रोके खड़ा
 
तय हुआ ६०० मावले तोड़ेंगे घेरा
जब बाहर रहेगा एकदम अँधेरा
 
बाजीप्रभु ने कहा जबतक हैं मेरे शरीर में प्राण
दुश्मन आपकी ले न सकेगा जान
 
बाहर अँधेरा था और थी ज़ोरों की बारिश
शिवाजी को बचाने की करनी थी सबको कोशिश
 
अँधेरे में ६०० मावलों के साथ हाथों-हाथ
निकल पड़ी दो पालकियां साथ साथ
 
एक पालकी में थे शिवाजी महाराज खुद 
दूसरे में महाराज का भेस धरे नाई शिवा कासिद
 
एक जगह घेरा था कमज़ोर
६०० बांकुरों ने तुरंत उसे दिया तोड़
 
आदिल शाही सेना में मच गयी अफरा तफरी
समझ में उन्हें आया दुश्मन ने की कहीं गड़बड़ी
 
तुरंत पीछा करने के लिए सेना दौड़ाई
पकड़ में आ गया शिवा कासिद नाई
 
पेश किया उसे सिद्दी जौहर के सामने
शिवाजी नाम बताया सबको उसने
 
पर किसी ने उसे पहचान लिया
तुरंत ही शिवा कासिद को मार दिया

अपने प्राण त्याग कर दिखाया शिवा कासिद ने सबको
निहत्थे भी तैयार थे अपने प्राण न्यौछावर करने को 

पर शिवा कासिद ने दे दिया इतना समय
काफी दूरी पैदल शिवाजी ने कर ली तय
 
इधर बाजीप्रभु ने कहा शिवाजी से
आप ३०० वीर लेकर निकल जाएँ चुपके से
 
इधर मैं ३०० सैनिक लेकर दुश्मन की करता हूँ अगवानी
आपको विशालगढ़ पहुंचकर तीन बार तोप है दगवानी
 
शिवाजी ने कहा साथ जियेंगे साथ मरेंगे 
बाजी ने कहा 'स्वराज्य' के लिए आप जियेंगे
 
बाजी ने कहा हम जीत लेंगे हारी हुई बाज़ी
आप तक पहुँच न सकेंगे ये दुश्मन पाजी 
 
पतले से दर्रे में बाजीप्रभु ने मोर्चा जमाया 
दुश्मन ने अल्लाह-ओ-अकबर का नारा लगाया  
 
दोनों दलों में होने लगी ज़बरदस्त मारकाट 
बाजी ने दुश्मनों की लाशों से दर्रे को दिया पाट
 
पर तीन सौ के सामने थे तीन हज़ार
कब तक ये रणबांकुरे उनसे पाते पार
 
लड़ते लड़ते बीत गयी सारी रात
बाजीप्रभु ने रख ली अपनी बात
 
लड़ते लड़ते बाजीप्रभु हो गए बुरी तरह घायल
पर दुश्मन भी उनकी बहादुरी का हो गया कायल
 
इतने में लगी उनके सीने में एक गोली
बाजी ने लगायी हर हर महादेव की बोली
 
बाजी ने कहा जब तक सुनाई न पड़े तोप की आवाज़
दुश्मन मुझे मार ना पायेंगे आज
 
उठकर बाजीप्रभु चल दिए फिर लड़ने
दुश्मन के बढ़ते दबाव में मावले भी लगे कटने
 
उधर विशालगढ़ भी था घिरा हुआ
पर शिवा लड़ते लड़ते अन्दर दाखिल हुआ
 
गढ़ में घुसते ही शिवाजी ने तीन बार तोप दगवायी
तोपों की आवाज़ सुनकर बाजी के चेहरे पे मुस्कान आयी 
  
बोले बाजी मर सकता हूँ अब मैं चैन से
बाजी का बलिदान व्यर्थ होता कैसे ?
 
बाजी और ताना जी का बलिदान न गया व्यर्थ
शिवाजी के 'स्वराज्य' को दिया एक नया अर्थ
 
बाजीप्रभु के बलिदान को याद रखेगा ज़माना
बच्चा बच्चा आज भी गाता है उनकी याद में तराना
 
 
                                                                                   - ए. के. श्रीवास्तव
                                                                                     ई - ५, नोट मुद्रण नगर,
                                                                                     मैसूर - ५७०००३, कर्नाटक
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